मुल / प्रतिनिधि : नसीर खान
मुल शहर में विकास के नाम पर जनता के पैसे की खुली बर्बादी का एक और मामला सामने आया है। मूल स्थित नए बस स्थानक के निर्माण के दौरान यात्रियों के बैठने के लिए लगाए गए स्टील बेंच महज दो–तीन वर्षों में ही भंगार बन गए। इन बेंचों को हटाकर अब वहां ईंट, सिमेंट, गिट्टी और काले ग्रेनेट से नए बेंच बनाए गए हैं।
नए बस स्थानक का उद्घाटन होते समय यह परिसर चमचमाते स्टील बेंचों से सुसज्जित था। ये बेंच करोड़ों नहीं तो कम से कम लाखों रुपये की लागत से लगाए गए थे। इतनी कम अवधि में इनका खराब हो जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या बेंचों की गुणवत्ता घटिया थी? क्या निर्माण में नियमों की अनदेखी की गई? या फिर यह सब भ्रष्टाचार का हिस्सा था—ऐसी विभिन्न चर्चाएं नागरिकों में जोरों पर हैं।
हटाए गए स्टील बेंचों के स्थान पर बनाए गए नए सिमेंट–ग्रेनेट बेंच किस निधि से बनाए गए, यह स्पष्ट नहीं है। चाहे ये बेंच महामंडल द्वारा बनाए गए हों या सरकारी निधि से, सच्चाई यही है कि खर्च किया गया पैसा जनता का है। वही जनता जो एसटी बसों से यात्रा करती है और हर वस्तु पर टैक्स भरती है।
जनता का सवाल है कि जब पहले से लगाए गए बेंच उपयोगी थे तो उन्हें इतनी जल्दी हटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि वे खराब थे तो उनकी गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं हुई? जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
विकास के नाम पर “यह तोड़ो–वह बनाओ” की यह प्रवृत्ति भ्रष्टाचार का सबसे आसान जरिया बनती जा रही है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कोई ठोस जांच करता है या फिर जनता का पैसा यूं ही बर्बाद होता रहेगा।
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