मुल / नासीर ख़ान :-
चंद ईमानदार लोगो को इस धरती पर जनम देकर उपर वाले ने आज के खुदगर्ज़ि के दौर में भी ईमानदारी और इंसानियत को जिंदा रखा है, तेज़ रफ्तार दौड रही ट्रेन में घटीत एक ताज़ा घटना इंसानियत की मिसाल बन जनचर्चा का विषय बन बैठी है.!Humanity is the topic of public discussion while traveling in the express train!!!
तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए गए मुल निवासी विक्की चावला, आकाश कावले, संदीप मोहबे, नवनीत शेंडे, गिरीश गुरुनुले, सुनील लांजेवार, हरिश रायपुरे और भूपेश वाढई दर्शन के बाद अपने शहर मुल लौट रहे थे. बिलासपुर जाने वाली एक्सप्रेस 12852 अपनी रफ्तार से दौड रही थी और सभी यात्री अपनी बर्थ पर गहरी निंद में सो रहे थे तभी विक्की चावला को एक पर्स निचे फर्श पर पडा हुआ मिला. विक्की ने पहले तो अपने सहयोगी मित्रों से पुछा,सभी ने ना मे इन्कार किया. पर्स नोटों से भरा था.
. एक आवाज ने सभी सोने वालों को चौका दिया " अरे भाई यह पर्स किसका है ". सभी यात्री जाग उठे अपनी जेब टटोलने लग गये. तभी उपर की बर्थ पर रहे एक यात्री ने घबराई हुई आवाज़ में कहा भाई मेरा है और उसमे 30 हज़ार रूपये है. उस यात्री को उतारा गया और सभी के सामने उस पाकेट की रकम गिनी गयी जो वह पुरी 30 हज़ार थी. पर्स मे रहा आधार कार्ड भी उसी का था ईसलिए वह पाकेट उसी का था यह निश्चित होने पर नोटों सहित पर्स उसे दे दीया गया.
यात्री ने पुछताछ मे बताया के वह काम के लिए मजदुर की हैसियत से चेन्नई गया था. महीनों बाद वह अपने घर एम.पी. के ज़िला बालाघाट लौट रहा है. बिवी बच्चों को पहले ही बता चुका था के वह आज लौट रहा है. महीनो बाद परिवार का प्रमुख मेहनत मशक्कत की 30 हज़ार की पुजी लेकर लौट रहा है, आज अगर वह पाकेट किसी खुद गर्ज के हाथ लग जाता तो उस मेहनत कश का और उसके परिवार का क्या हाल होता.शायद यही सोचकर उस यात्री के आंखों से आंसु निकल पडे और उसने बालाजी के दर्शन कर लौट रहे उन सभी युवाओं से गले लगकर खुशी के आंसु बहाता धन्यवाद व्यक्त करता रहा. डिब्बे के सभी यात्री ईस घटना पर आंसु झलकाते यही कहने लगे के ईमानदारों के कारण ही आज यह धर्ती टिकी हुई है जिसमें इंसानियत के दर्शंन यदा कदा होते रहते है!
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